*छंट गया कोहरा*

*छंट गया कोहरा*

 *छंट गया कोहरा*

      स्नेहा और शिशर की शादी तय हो गई थी । वह दूसरे शहर में नौकरी करता था। स्नेहा अपने पिता के साथ रहती थी। उसके पिता को उसकी शादी की बहुत ही ज्यादा चिंता थी।  शिशिर और स्नेहा के पिता मित्र थे। इसलिए उन्होंने दोनों बच्चों की शादी तय कर दी थी।स्नेहा के पिता चाहते थे कि यह शादी जल्दी हो जाए। इसलिए उन्होंने जल्दी का मुहूर्त निकालने के लिए कहा जो शिशिर  को ठीक नहीं लग रहा था। लेकिन वह अपने पिता से कुछ कह नहीं पाया ।


       दोनों की शादी हो गई। जिस दिन बारात वापस आई उसी दिन शिशिर के पिता सीढ़ियों से गिर गए ।उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया। उनके सिर पर बहुत ज्यादा चोट आई थी ।शादी में आए मेहमान तरह तरह की बातें करने लगे कि स्नेहा के कदम अशुभ है । उसके आते ही उसके ससुर जी हॉस्पिटल पहुंच गए। यह सब बातें सुनकर शिशिर विचलित हो गया। घर के सभी लोग हॉस्पिटल पहुंच गए। 

स्नेहा भी उनके साथ आनन-फानन में हॉस्पिटल पहुंची। वह दुल्हन के की वेशभूषा में ही थी ।उसे हॉस्पिटल में देखकर शिशिर अचानक चिल्लाने लगा कि इसे यहां आने की क्या जरूरत थी। चुपचाप घर में जाकर रहो और इस तरह से सज धज कर क्यों आयी हो ।स्नेहा तो उसकी बात सुनकर अचंभित रह गई ।और वहां से वापस आ गई। उसने अपने कपड़े बदले और हल्के गहने पहने ।रोज दिन हॉस्पिटल जाती और बाबूजी की सेवा करती थी। लेकिन बाबूजी की हालत में कोई सुधार नहीं आया और सबको छोड़ कर  चले गए। शिशिर स्नेहा को ही अपने बाबू जी की मौत का दोषी मानने लगा था ।

सारे क्रिया कर्म होने के बाद   शिशिर की माँ वीना जी ने उसकी बहन और अन्य महिलाओं से कहा कि  गृह प्रवेश और विवाह के बाद होने वाली  रस्म पूरी करें। शिशिर का  बिल्कुल भी मन नहीं था।  लेकिन मां का मन रखने के लिए उसने सारी रस्मों को किया। इतने दिनों तक उसने स्नेहा से बिल्कुल भी बात नहीं की थी। स्नेहा भी सोचने लगी कि धीरे-धीरे स्थिति ठीक होगी।  इसलिए वह भी चुपचाप सारे काम करती थी ।

      छुट्टियां खत्म होते ही शिशिर अकेले ही अपनी नौकरी पर वापस चला गया। माँ बार-बार उसे स्नेहा को भी ले जाने के लिए कहती थी। लेकिन वह हमेशा बहाना बना देता था ।मां भी सारी बातों को समझ रही थी। वह शिशिर को समझाने की बहुत कोशिश करती । लेकिन शिशिर के मन पर तो गलतफहमी का कोहरा छाया था। शिशिर पर उनकी बातों का कोई असर नहीं होता था। इन सब घटनाओं का कारण स्नेहा और उसके पिता जिन्होंने  शादी में जल्दबाजी दिखाई थी  को मानता था। 

    ऐसे ही दिन गुजर रहे थे।स्नेहा ने सोचा कि मैं ऐसे ही खाली रहूंगी इससे अच्छा मैं अपनी आगे की पढ़ाई कर लेती हूं और उसने पीएचडी करने का निश्चय किया। घर के सारे काम करती ,अपनी सासू मां का पूरा ध्यान रखती, शोधकार्य भी करती थी । शिशिर जब भी छुट्टियों में आता माँ स्नेहा से उसके लिए तरह-तरह के खाने बनवाती। स्नेहा बिना कुछ कहे सारी चीजें बना देती थी।

  स्नेहा को तो शिशिर की उपेक्षा की  आदत पड़ गई थी। वह अपने मायके भी वापस नहीं जाना चाहती थी क्योंकि वह अपने पिता की चिंता और नहीं बढ़ाना चाहती थी। 

        ऐसा करते-करते लगभग 3 साल गुजर गए।  वीना जी को उच्च रक्तचाप और मधुमेह की  बीमारी हो गई थी। जिसके लिए उन्हें हमेशा अस्पताल में नियमित जांच करवाने जाना पड़ता था। स्नेहा ही उन्हें जांच के लिए ले जाती थी।  समय से उन्हें दवाई खिलाकर, उनकी देखभाल करती थी। वीना जी स्नेहा को देख देखकर मन ही मन दुखी होती थी कि पता नहीं शिशिर को इसका महत्व कब समझ में आएगा। वह  फोन  हमेशा शिशिर को दोनों को साथ ले जाने को  कहती।लेकिन वह स्नेहा के कारण मां को ले जाता नहीं चाहता था।वीनाजी स्नेहा को छोड़कर जाने को तैयार नही थीं।

      इसी तरह एक बार जब शिशिर छुट्टियों में आता है तब मां बताती है कि कुछ दिन पहले ही  शिशिर के जीजा जी का एक्सीडेंट हो गया था और आपातकाल में उन्हें ऑपरेशन की जरूरत थी ।उस समय शिशिर टूर में गया था उसका फोन भी नहीं लग रहा था ।बहुत ज्यादा पैसों की आवश्यकता थी ।

तब  स्नेहा ने अपने सारे गहने दे दिए और कहा कि मेरे लिए  इनकी कोई अहमियत नहीं है किसके लिए पहनूंगी। अभी जीजा जी की जिंदगी बचाना ज्यादा जरूरी है। और उसने निस्वार्थ भाव से सब कुछ दे दिया। जब यह बात शिशिर ने सुनी तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ। वह तो स्नेहा को स्वार्थी समझता था जो अपने पिता के घर वापस नही जा रही थी। 

      । इसी बीच एक दिन वीना जी को लेकर हॉस्पिटल जाना था। शिशिर भी साथ में गया। सब जांच करवाने में दिन भर का समय लग गया। स्नेहा साथ में दवाइयां और खाने पीने का सामान लेकर गई थी और समय-समय पर वीना जी को खिलाते रहती थी। शिशिर तो कुछ कर ही नहीं पा रहा था ।क्योंकि उसे ज्यादा जानकारी ही नहीं थी। सारा कुछ नेहा ही कर रही थी ।जब शाम को सब वापस आए तो मां ने कहा कि आज आलू पराठे बना दो । स्नेहा ने बिना कुछ कहे आलू परांठे बनाए। शिशिर उसे देख रहा था कि यह लड़की दिन भर हॉस्पिटल में यहां से वहां जाती रही। तरह-तरह के जांच करवाती रही। मां को सहारा देकर चलती रही और घर में आकर भी इतनी थकी होने पर भी इसने खाना बनाया है ।उसने रात को देखा देर तक स्नेहा के कमरे की लाइट जल रही थी। रात को स्नेहा अपने शोध पत्र लिखने का काम करती थी। स्नेहा की दिनचर्या देख  कर शिशिर को बहुत आश्चर्य हुआ इतनी सी जान और इतने सारे काम वो कैसे कर लेती है ।मैं तो एक ही दिन में थक गया ।

      दूसरे दिन  दोपहर को वीना जी पड़ोस में कीर्तन में गई थी ।स्नेहा रसोई समेटने का काम कर रही थी। तब शिशिर ने जाकर उससे एक कप कॉफी की फरमाइश की और अपने कमरे में आ गया।

 दोनों के कमरे अलग-अलग थे ।स्नेहा जब कॉफी लेकर कमरे में आई तो पहली बार शिशिर ने उसे बैठने को कहा। शिशिर ने उसका हाथ पकड़ लिया और इतने दिनों तक उसके साथ किए गए व्यवहार के लिए माफी मांगी। स्नेहा के लिए यह सब भुलाना आसान तो नहीं था।फिर भी उसने उसे माफ कर दिया। शिशिर के मन पर स्नेहा के लिए जो   गलतफहमी का कोहरा छाया था वह छंट गया  और उसे स्नेहा एक अलग ही रूप में दिखाई दे रही थी। 

     जब वीना जी वापस आई तो दोनों को एक साथ देख कर उन्होंने उन्हें बहुत-बहुत आशीर्वाद दिया।




स्वरचित 

नीरजा नामदेव

13-05-2021

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