मैं आती रहूँगी माँ

मैं आती रहूँगी माँ

 मैं आती रहूँगी माँ 


     वसुधा और सुनिल का छोटा सा परिवार था। उनके साथ उनके दो बच्चे रिया और राहुल और वसुधा की मां आशाजी रहती थी ।वसुधा उनकी इकलौती संतान थी। 




आशाजी की उम्र बहुत ज्यादा हो जाने के कारण उस साल  उनकी देखभाल करने के लिए सुधा उन्हें अपने साथ ले आयी थी ।वसुधा भी नौकरी करती थी।

 वसुधा और सुनील दोनों मिलकर आशाजी की देखभाल करते थे । सुबह के समय जब वसुधा घर के काम करती रहती थी

 तो सुनील आशाजी को सैर कराने ले जाते थे। उनकी दवाइयों का ध्यान रखते थे और नियमित डॉक्टर के पास ले जाते थे ।एक दिन भी इस काम में नागा नहीं करते थे।              

हर साल सुनील अपने परिवार के साथ छुट्टियों में अपने गांव जाते थे। बीच बीच में अकेले चले जाते थे।लेकिन इस साल वसुधा की मां के साथ रहने से वह सोचने लगे कि इस साल  हम यहीं रहेंगे,क्योंकि वसुधा की मां को गांव ले जाना सही नहीं है। 

उन्हें हमेशा डॉक्टर की आवश्यकता पड़ती थी।  वे इस बारे में वसुधा से बात करते हैं। जब आशा जी को यह बात मालूम होती है  तो वे वसुधा  को कहती हैं कि सुनील मेरी देखभाल बेटे से भी बढ़कर  करते हैं तो तुम्हें भी गांव जाकर अपने सास ससुर के साथ रहना चाहिए ।   

अपनी माँ की बात सुनकर वसुधा  सुबह  सुनील से कहती है कि मैं गांव जाना चाहती हूँ। यहां की व्यवस्था आप संभाल लेंगे। मैं खाना बनाने वाली से बात कर लेती हूँ । 

वह दिन में माँ के साथ रहेगी।वसुधा की यह बात सुनकर सुनील बहुत ही प्रसन्न होते  हैं । 

वसुधा गांव जाने की तैयारी करती है। अपने सास-ससुर के लिए उपहार और बहुत सारी चीजें लेती है । दूसरे दिन वह  राहुल को लेकर गांव जाती है ।रिया सुनील  और नानी के साथ यही रहती है। 

सुधा बस में सफर करके 3 घंटे बाद गांव पहुंच जाती है ।रिक्शे में  घर पहुंचती है । जैसे ही राहुल को गोद में लेकर उतरती है, उसकी सास कुसुमजी आंगन से उसे देखकर दरवाजे की तरफ दौड़ते हुए आती है। 

राहुल को अपनी गोद में ले लेती हैं और अपने पति दीनदयाल को आवाज देने लगती हैं  देखो तो कौन आया है । दीनदयाल जी वसुधा  और राहुल देखकर बहुत ही खुश हो जाते हैं।

सबका हालचाल पूछते हैं और जब वह सुनते हैं कि सुनील अपनी सासू मां की देखभाल के लिए शहर में ही रुका है तो वह उसे बहुत ही आशीर्वाद देते हैं ।    

वसुधा अपनी सासू मां से कहती है ,मैं जल्दी से नहा कर आती हूं। आप कुछ मत बनाइए मैं आकर नाश्ता बनाऊंगी । कुसुमजी कहती हैं तुम्हारा ही तो घर है बहुरिया जो मन लगे वही करो। वसुधा नहाकर आती है।

 गरम-गरम हलवा बनाकर लाती है।  राहुल दादा दादी के साथ खेलने में मगन रहता है।सास ससुर दोनों  हलवा खा कर बहुत खुश होते हैं।

कुसुमजी कहती हैं अब मुझसे ज्यादा कुछ बनाया नहीं जाता ,सादा खाना बना लेती हूं। वसुधा खाना बनाती लगती है ।सब खा पीकर दोपहर को थोड़ा आराम करते हैं।     

शाम को  गांव के रिश्तेदार वसुधा से  मिलने आने लगते हैं और कहते हैं कि बहुत अच्छा किया जो तुम यहां राहुल को लेकर आ गई ।नहीं तो यह दोनों तो एकदम उदास हो जाते। 

जबसे सुनिल की चिट्ठी आई थी कि इस साल गर्मी की छुट्टीयों में हम नहीं आ पाएंगे, दोनों कई दिनों तक उदास रहे थे ।इसी तरह तुम लोग आते जाते रहा करो ।

इन्हें भी अच्छा लगेगा। तब सुधा को महसूस होता है कि जो यह कह रहे हैं वह एकदम सच है।फिर भी इन्होंने कभी भी गांव आने के लिए हमसे जिद नहीं की। 

हमेशा हमारी सुविधा का ध्यान रखा। रात को  राहुल अपने दादा दादी के साथ कहानियां सुनते हुए आंगन में सो जाता है ।।   

सुबह होते ही वसुधा को दीनदयाल जी खेतों की सैर करवाने ले जाते हैं,जहां गर्मी की फसल गेहूं , उड़द, मूंग आदि लगे हुए होते हैं ।

वे खेतों के बारे में वसुधा को सारी जानकारी देने लगते हैं ।ठंडी ठंडी हवा चलती रहती है। वसुधा को यह वातावरण बहुत ही अच्छा लगता है। वापस आकर  वसुधा घर के काम करने लगती है। 

बीच-बीच में आकर दोनों से बात भी करती जाती है।उनकी पसंद पूछ कर तरह तरह का भोजन बनाती है।     

इस प्रकार दिन बीतते रहते हैं ।दीनदयाल जी और कुसुम जी बहुत ही खुश रहते हैं ।एक दिन वसुधा राहुल और दीनदयाल जी को नाश्ता करने के लिए ढूंढती है तो कुसुम जी बताती है कि दोनों तो बगीचे में है ।

वसुधा बगीचे में जाती है ।दीनदयाल जी राहुल के हाथों अनार का पौधा रोपते रहते हैं। वसुधा के आने पर बगीचे में लगे हर  पेड़ पौधे के बारे में बताते हैं। 

हर  पेड़ पौधे की एक अलग कहानी है ।दीनदयाल जी हर अच्छे अवसर पर यादगार के रूप में एक पौधा लगाते थे।         

 ऐसा करते करते एक बगीचा तैयार हो जाता है। सुनील के जन्म से लेकर राहुल के जन्म तक अनेक अवसरों पर उन्होंने पौधे लगाए थे जो अब पेड़ बन गए थे।

आम का पौधा दिखाते हुए कहते हैं कि यह मैंने तुम लोगों के विवाह पर लगाया था ।अब फल देने के लिए तैयार हो गया है ।आज राहुल ने जो पौधा लगाया है देखना कुछ सालों बाद उसमें भी सुंदर सुंदर अनार लगेंगे ।

हर पौधे के बारे में बताते हुए दीनदयाल जी उसे प्यार से सहलाते जा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो वह अपने बच्चों को ही प्रेम कर रहे हैं ।उनकी आंखों में खुशी के आंसू छलक आते हैं । 

वसुधा से कहते हैं कि बच्चे तो बड़े होकर अपनी जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं ,हम दोनों इन्हीं पौधों को अपने बच्चों की तरह प्रेम करते हैं। और बच्चों को अपने पास महसूस करते हैं। उनकी बातें सुनकर वसुधा की आंखें भी छलकने लगती हैं।वह इन भावनाओं और बातों से इन अनजान थी।

 एक-एक करके दिन बीतने लगते हैं।वसुधा को हर दिन कोई न कोई नई बात पता चलती थी। ऐसा करते करते वसुधा के वापस जाने का दिन आ जाता है ।

वसुधा का मन बिल्कुल भी वापस जाने को नहीं करता है ।उसे लगता है कि काश और छुट्टियां होती और वह कुछ दिन और यहां रह पाती। कितना कुछ है अभी उसे जानने, समझने और देखने के लिए ।

वह मन ही मन सोचती है कि मैं हर साल आती रहूंगी और यह सिलसिला कभी नहीं टूटेगा। 

कुसुमजी तो वसुधा के साथ ले जाने के लिए ढेरों सामान तैयार कर लेती हैं। नमकीन ,मिठाई ,फल, अचार और बहुत कुछ। सब को देख कर वसुधा भाव विभोर हो जाती है ।

विदाई के समय कुसुमजी वसुधा को बहुत सुंदर साड़ी और सुहाग का सामान देते हुए कहती हैं  'ऐसे ही आते रहना बहुरिया , हमारे नन्हे और रिया को भी लेकर आना। हमें इस बार की छुट्टियां बहुत ही अच्छी लगी।      

गांव भर के लोग वसुधा और राहुल को विदा करने आते हैं ।वसुधा सबसे विदाई लेती है और बस में बैठे बैठे कहती है  'मैं आऊंगी ,जरूर आऊंगी माँ और  हमेशा आती ही रहूंगी ।'

उसे आशाजी की कही बातें याद आती हैं और वह अपनी माँ को सही बात समझाने के लिए मन ही मन धन्यवाद देती है। 

(यह कहानी मैंने बहुत पहले कभी सुनी थी,आज अपने शब्दों में प्रस्तुत कर रही हूं)



स्वरचित

रचनाकार 

नीरजा नामदेव   

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