"कन्याओं की हड़ताल"

"कन्याओं की हड़ताल"

"कन्याओं की हड़ताल" 



ब्रम्हा जी हाथों में कलम-किताब लिए चिंतित से बैठे हुए थे। नारद जी ने उन्हें चिंताग्रस्त देख पूछा-"हे प्रभु पहली बार मैं आपको इस कदर चिंतायुक्त देख रहा हूं, इसका क्या कारण है?




 ब्रम्हा जी ने नारद जी की ओर देखा और कहा-अब क्या बताऊँ आपको देव ऋषि नारद, बहुत गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। जिसका निवारण होना संभव नही लग रहा। नारद- प्रभु ऐसा क्या अनर्थ हो गया? कृपया विस्तार से मुझे बताइये। 

ब्रम्हा जी- ये किताब देख रहे है आप, इसमे पृथ्वीलोक की जितनी भी गर्भवती महिलाएं है उनकी जानकारी दी हुई है। समस्या ये है कि आज जिन महिलाओं का प्रसव होना है उनमें आधे से ज्यादा महिलाएं कन्या को जन्म देंगी। नारद- तो प्रभु इसमे चिंता की कौन सी बात है? 

ब्रम्हा जी- देवर्षि नारद यही तो चिंता का कारण है। स्वर्ग में जितनी भी कन्याएं है वो पृथ्वीलोक में जाना ही नही चाहती। नारद- ये आप क्या कह रहे है प्रभु? ऐसा कैसे हो सकता है? ब्रम्हा जी- बस यही चिंता मुझे सताये जा रही है।

 कन्याओं ने हड़ताल कर दी है कि वो पृथ्वीलोक नही जाएंगी। और अगर उनकी ये बात नही मानी गई तो वो पृथ्वीलोक में एक पल भी नही रुकेंगी। नारद- लेकिन प्रभु आज तक तो ऐसा कभी सुनने में नही आया कि यहाँ देवलोक में कभी हड़ताल की नौबत आई हो, 

फिर ये कन्याओं को हड़ताल की कहा से सूझी? ब्रम्हा जी- ये सब पृथ्वीलोक की देखा-देखी है देवर्षि। हड़ताल का कारण भी उन्होंने बताया है। उनका कहना है कि जिस स्थान पर हमारी कदर नही हम वहाँ कैसे जा सकते है, 

आये दिन पृथ्वीलोक में नारियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को देख कर किसी का भी मन भर सकता है। आज-कल तो कन्याओं पर भी लोगों को दया नही आती। पहले तो लोग कन्याओं को माँ देवी का रूप मानकर उनकी पूजा करते थे, 

लेकिन अब उनके साथ बलिष्ठपूर्ण व्यवहार किया जाता है। मेरी बनाई हुई रचना का इस प्रकार अनादर देख कर मुझे भी दुख होता है, मेरा दिल भी रो देता है जब किसी रोती-तड़पती हुई बच्ची को देखता हूं, लेकिन ये इंसान कैसे पत्थरदिल हो जाता है। 

 मैंने दो जीवों का निर्माण किया था, एक पुरुष एक स्त्री। पुरुष को मैंने बल दिया जिससे वह जीवन भर स्त्री की रक्षा कर सके, एक पिता के रूप में एक भाई के रूप में एक पति के रूप में। और स्त्री को कोमल हृदय दिया। लेकिन पुरुष अपने बल का प्रयोग भी स्त्रियों पर ही दिखाने लगा। 

अपने बाहुबल के घमंड में इतना अंधा हो गया कि उसे स्त्री हो या बच्ची सिर्फ एक वस्तु नजर आने लगी। नारद- प्रभु बात तो आपकी बिल्कुल सही है। और कन्याओं की हड़ताल भी बिल्कुल जायज है। पुरुष का आतंक इतना बढ़ने के बाद भी आज भी स्त्रियां अपनी कोख से सिर्फ पुरुष को ही जन्म देना चाहती है।

 इसलिए अब आपको कन्याओं की बात मानकर सभी गर्भवती स्त्रियों को पुत्र ही प्रदान करना चाहिए। इससे देवलोक में कन्याओं की बात भी रह जायेगी, और पृथ्वीलोक में भी सबकी मनोकामना पूरी हो जायेगी। ब्रम्हा जी- (मुस्कुराते हुए) नारद जी ये उपाय तो बहुत पहले ही कर लेता मैं, लेकिन मुझे इसका दुष्परिणाम भी ज्ञात है। 

बिना कन्याओं के पृथ्वीलोक वैसा ही होगा जैसे बिना पानी के नदी, बिना फल के पेड़, बिना सूर्य के आकाश। नारिजाति एक ऐसा अलंकरण है जो पुरुषों के माथे में शोभायमान होता है, भूलवश पुरुष उसे अपनी पैरों की धूल समझ बैठा है।

 जन्म के समय पुरुष को एक नारी पालती-पोसती है, बिना माँ के जीवन कैसा होता है ये किसी बिन माँ के बच्चें से पूछिये। बहन बन के भाई को बुरी बालाओं से बचने वाली भी स्त्री ही होती है। पत्नी बन पति के जीवन में खुशियां लाने वाली और कदम से कदम मिला कर चलने वाली भी एक स्त्री होती है। 

 पुरुष पूरी तरह से स्त्री पर निर्भर होता है। अब आप ही बताइये बिना स्त्री के पृथ्वीलोक की कल्पना कैसे की जा सकती है। नारद- (कुछ सोचते हुए) आप उन सभी कन्याओं को यहाँ बुलाइये, मैं उनसे इस समस्या से का हल पूछता हूं।

 (सभी कन्यायें नारद जी और ब्रम्हा जी के सम्मुख उपस्थित होती है) कन्यायें- प्रणाम ब्रम्हा जी, प्रणाम नारद जी। आपने हम सभी को यहाँ बुलाया। नारद- माँ दुर्गा की तरह पूजनीय आप सभी को मेरा चरण वंदन। आप सभी ने ये कैसी जिद पकड़ ली है। 

इसका परिणाम प्रकृति के नियमानुसार नही है। आप लोगों को कभी ना कभी पृथ्वीलोक जाना ही होगा, आप अपनी इस जिद को त्याग दें। कन्यायें- ये आप क्या कह रहे है नारद जी? हम प्रकृति के नियमों का उल्लंघन कर रहे है? ये जो पुरुष प्रधान समाज है

 ये क्या प्रकृति का उल्लंघन नही कर रहा? हमने अपनी आंखों से निर्भया, आसिफा, अनामिका और ना जाने कितनी ही ऐसी लड़कियों को देखा है। क्या आप चाहते है कि हमारी भी वही दशा हो? यहाँ हमे जितना आदर मिलता है वहाँ क्यों नही? 

ब्रम्हा जी- आप क्या चाहती है ये बताइये। कन्यायें- हम सिर्फ इतना चाहते है कि हमे इंसान समझा जाये, हम कोई मनोरंजन की वस्तुएं नही है। नारद जी- प्रभु जिस पृथ्वीलोक में जानवर सुरक्षित नही है वहाँ ये फूल से भी कोमल कन्यायें कैसे सुरक्षित रहेंगी? 

ब्रम्हा जी- बस इसी बात से चिंतित हूं मैं। मैंने जब सृष्टि की रचना की थी तब वो पृथ्वीलोक स्वर्ग से भी सुंदर था। देवताओं ने भी वहाँ निवास किया है। 

लेकिन आज वहाँ की हालत ऐसी हो गई है कि वहाँ कोई भी जाने को तैयार नही हो रहा। क्या इस सृष्टि का अंत यहीं हो जायेगा। अब इस सृष्टि को पुरुष ही बचा सकते है वरना आने वाले समय के जिम्मेदार वो खुद होंगे। 



समाप्त 

Anju Anant 

 स्वलिखित रचना
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